
संवाददाता अखिलेश विश्वकर्मा गढ़वा श्री बंशीधर नगर : प्रयागराज से पधारे कथावाचक जगदगुरू रामानुजाचार्य श्री मुक्तिनाथ स्वामीजी महाराज ने गोकर्ण और उनके भाई धुंधकारी का हृदयस्पर्शी प्रसंग सुनाते हुए कहा कि कथा श्रवण मात्र से प्रेत योनि में भटक रही आत्मा को भी मुक्ति मिल जाती है, जैसे धुंधकारी को प्रेत योनि से मुक्ति मिल गई।
स्वामी जी श्रीराधावंशीधर मंदिर में श्रीकृष्ण जन्मोत्सव के मौके पर आयोजित श्रीमद्भागवत कथा सप्ताह के द्वितीय दिवस प्रवचन कर रहे थे।
उन्होंने गोकर्ण और धुंधकारी प्रसंग की विस्तार से चर्चा करते हुए कहा कि धुंधकारी ने सांसारिक भोग विलास और पापकर्मों में जीवन नष्ट कर दिया था। परिणामस्वरूप अकाल मृत्यु के बाद वह प्रेत योनि में भटकने लगा और असहनीय यातनाएं भोगने लगा।
भाई की पीड़ा देखकर महात्मा गोकर्ण ने उसे मुक्ति दिलाने का निश्चय किया। उन्होंने सात दिनों तक श्रीमद्भागवत कथा का आयोजन किया। कथा के दौरान वातावरण भक्ति और भावनाओं से सराबोर रहा। सातवें दिन जैसे ही कथा का विश्राम हुआ, ठीक उसी समय धुंधकारी का प्रेत रूप दिव्य प्रकाश में विलीन हो गया और उसे परमधाम की प्राप्ति हुई।
स्वामी जी महाराज ने इस प्रसंग के माध्यम से श्रोताओं को संदेश दिया कि श्रीमद्भागवत कथा मोक्षदायी है। श्रीमद्भागवत केवल एक ग्रंथ नहीं, बल्कि आत्मा की मुक्ति का सेतु है।
स्वामी जी महाराज ने कथा में श्री राधा वंशीधर जी के प्राकट्य और उनकी महिमा का वर्णन किया। कथा के दौरान भजन, भगवन्नाम संकीर्तन और श्री राधा वंशीधर जी के जयकारों से पूरा पंडाल गूंज उठा। बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं ने श्रीमद्भागवत कथा का रसपान किया।






